11 मई, 2018

तमाशा नहीं,मिसाल बनो

आज किताब की अलमारी साफ़ करते हुए एक पुरानी सी डायरी दिखी।  दिल की  धड़कन  इतनी तेज हो गयी की मैं उसकी आवाज़ साफ़ सुन सकती थी। दिमाग और दिल दोनों उस डायरी को खोलने से रोक रहे थे। पर, हाथों ने पीले पड़ चुके पन्ने को पलटना शुरू कर दिया और आँखों ने उसे पढ़ना शुरू कर दिया था।

5/5/93
गर्मी की छुट्टी में हम नानी के घर जा रहे है। खूब मस्ती करेंगे। बंगलोर से रांची का सफर तीन दिन का होता है। हम ने हटिया-यशवंतपुर में सेकंड क्लास का टिकट लिया है। 7 मई को हम नानी के घर पर होंगे। नानी के घर में जो बात मुझे सबसे अच्छी लगती है वह है आँगन और घर के पीछे वाला बगीचा।

26/6/93
नहीं, मुझे नहीं जाना चाहिए था यहाँ। ट्रेन में भी सामने बैठे अंकल बार-बार मेरी छाती को घूर रहे थे।  माँ-पापा दोनों ने ये बात नोटिस की पर, कोई कुछ नहीं बोला। और फिर उस दिन रात को खाने पर मामा जी के फ्रेंड विकास  मामा आये थे। खाने के बाद हम सब बैठ कर अंतराक्षी खेल रहे थे और बीच  में ही लाइट चली गयी। अचानक विकास मामा का हाथ मेरी जांघो पर आगया।  मैं डर गयी पर मुँह से आवाज़ नहीं निकल पायी।  लालटेन लेकर आ रही थी।मैं जल्दी से उठने लगी तो उन्हों ने मुझे "मेरी गुड़िया कहाँ जा रही है" कह कर अपनी गोद  में बैठा लिया और फिर.... नहीं मैं नहीं बाता सकती किसी को....मुझे यहाँ आना ही नहीं चाहिए था।                         मेरी आँखों से आंसू बहने लगे।  मैं आहिस्ता -आहिस्ता अपने वर्तमान को छोड़ अपने अतीत में जा रही थी. .मैंने कई पेज एक साथ पलट दिए।

5/9/94
शिक्षक -दिवस के मौके पर मैं और मेरी सहेलियों ने ग्रुप डांस किया था। लंहगा-चुनी में मैं बहुत सुन्दर दिख रही थी। राहुल मेरे पास आकर बोला-" यू आर लुकिंग वैरी ब्यूटीफुल"। मैं तो शर्मा ही गई थी।

14/2/95
मुझे पता था कि राहुल मुझे प्रोपोज़ करेगा। उसने स्कूल गेट पर ही मेरा रास्ता रोक दिया और फिर बिना वक़्त बर्बाद किये उसने जल्दी से बोल दिया- "लम्हा,आई  लव यू।"  मैंने कुछ नहीं बोला।  बस उसके साथ अपनी क्लास रूम की तरफ चल दी। हमें एक साथ आता देख अमित ने कहा- "भाभी आगयी..." और फिर सब हंसने लगे। मेरा जवाब जाने बिना ही क्लास ने कंफ़र्म कर दिया कि मैं राहुल की गर्लफ्रेंड  हूँ। मैं क्यों  उसी वक़्त उसे मना नहीं कर पाई ? शायद मैं बात बढ़ाना नहीं चाहती थी...पता नहीं।

16/3/95
परीक्षा शुरू होने वाली है। अब मुझे अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगाना है। मैंने अभी तक राहुल को कुछ नहीं बोला है और मुझे कुछ बोलना भी नहीं है। मेरे बोले बिना ही सब ने तय कर दिया है। पर, "आई  डोंट लव राहुल" ये बात पक्की है। खैर अगले साल 10वीं की परीक्षा है सो मेरे लिए तो "नो टाइम फॉर लव"।


1/5/95
10th क्लास का पहला दिन और आज सुबह ही मेरा पीरियड्स आ गया। क्लास मिस नहीं कर सकती थी इसलिए गयी और वही हुआ जिसका डर था। ब्लू स्कॉर्ट पर लाल दाग जो भूर रंग जैसा लग रहा था।  हे भगवन! कितनी शर्म आर ही थी मुझे। पता नहीं कैसे और कहाँ से अचानक राहुल मेरे कानों के पास आकर बोला - "लॉन्ग लास्टिंग यूज़ करती तो ऐसा नहीं होता"। फिर वह अपने दोस्तों के साथ हँसता रहा। मैं उस वक़्त जोर-जोर से रोना चाहती थी। भगवान से मना रही थी कि की ये धरती फट जाये और मैं उस मे समा जायूँ। पर, ऐसा कुछ नहीं हो रहा था। सो, मैं धीरे से उठी और सुषमा मैडम को अपनी परेशानी बता कर घर जाने की इजाजत मांग ली। राहुल की हँसी अब मुझे हर महीने याद आएगी।  
                                                     मैं इसके आगे का नहीं पढ़ पाई। खुद की लिखी डायरी को मैंने फाड़ डाला। अंदर का गुस्सा, घुटन सब चीत्कार के साथ बाहर निकल रहा था। इतने साल मैं जिस पल से आँखे चुराते आई आज वह पल मेरे सामने फिर से ज़िंदा होगया था। खुद पर मुझे आज बहुत गुस्सा आ रहा था। गुस्से में अपने को थपड मारा, यहाँ तक की अपना सिर भी दीवाल पे मारा। खुद को दीवाल पर इतनी जोर से धकेला था की चक्कर आगया। अपने  आप को समेटती हुई बिस्तर पर बैठी तो लौट आयी अपने वर्तमान में।  1993 को बीते  24 साल होगे है। 2017 में मैं पत्नी हूँ। 13साल की बेटी की माँ हूँ। मैं सधाहरण- सी घरेलु औरत हूँ। बजट-सत्र नहीं समझ आता मुझे। राजनीति भी नहीं जानती। अगर जानती हूँ तो इस बढ़ती महगांई में अपनी गृहस्थी चलाना।   
                             घर की सफाई में मिली मेरी बचपन की डायरी ने मुझे एक बात याद दिला दी है कि जो गलती मेरे मम्मी-पापा ने की थी और जो मुझ से भी हुई है वह गलती मैं अपनी बेटी के साथ नहीं दुहरायुगी।  मेरी माँ ने अंकल की गन्दी नज़र को अनदेखा किया क्योकि वह बेवजह तमाशा नहीं बनाना चाहती थी। मैं मामा की उस गन्दी हरकत वाली बात किसी को नहीं पता पाई। क्योकि मैं तमाशा नहीं बना चाहती थी। राहुल के प्रपोजल को रिजेक्ट नहीं कर पायी क्योकि मैं बेवहज का तमाशा नहीं चाहती थी। 
       मैंने उस हर बड़ी बात को "बेवजह" बना दियाथा। तमाशा न बने इस डर से मैं जिंदिगी भर अंदर ही अंदर घुटती रही। ये सब मैं अपनी बेटी के साथ नहीं होने दे सकती। मैं अपनी सोच में डूबी हुई थी कि  मेरे मोबाइल की घंटी बजी। देखा तो पलक के स्कूल से फ़ोन था। अचानक स्कूल से फ़ोन देख मुझे आश्चर्य हुआ। मैंने फ़ोन उठा कर हेलो बोला। सामने से प्रिंसिपल सर बोले -" मैडम आप अभी मेरे ऑफिस आ जाए। एक जरुरी बात करनी है।  "
"क्यों क्या हुआ सर? पलक ठीक तो है  न?" मैंने घबराकर  पूछा।  
प्रिंसिपल सर सख्त आवाज़ में बोले-"आप कितनी देर में यहाँ पहुँच सकती है?"
"मुझ ३०-३५ मिनट लग जाये गए।" मैंने उसी घबराहट में जवाब दिया।
"ठीक है" कह कर प्रिंसिपल सर ने फ़ोन कट कर दिया। 
एक हाथ से मैं डायरी के फटे पन्नों को समेट रही थी और दूसरे से अविनाश का नंबर लग रही थी। 
"हेलो, सुनो जी, पलक के स्कूल से फ़ोन  आया था। मुझे बुलाया है। मैं रेडी हो कर स्कूल पहुँचती हूँ आप भी हो सके तो आजाओ  "।
"अरे यार लम्हा! प्लीज ये सब तुम देख लो। मैं अभी नहीं आ सकता। तुम रेडी हो जाओ मैं  ola या uber कर देता हूँ। और अगर कुछ हो तो बताना। बाय "।  अविनाश से बहस करना बेकार है सो मैंने डस्टबिन में सारे कागज डाले और जल्दी से कपडे बदलने लगी।  उबेर आगयी थी। मैंने पर्स उठाया और कंघी हाथ में लेकर दरवाजा लॉक कर कार में बैठ  गयी।  ड्राइवर ने जर्नी स्टार्ट करने के लिए कोड माँगा। मैंने अपने मोबाइल में मैसेज चेक किया और उसे कोड बता दिया।  मैंने पूछा- "अड्रेस पता है?" 
ड्राइवर ने बोला -"जी,पता है। अभी ट्रैफिक कम होगा इसलिए २५-३० में पहुंच जायगे"।
कार चल रही थी और मेरे मन में ढेरों आधे-अधूरे बुरे ख्याल आ-जा रहे थे। डायरी के पीले पन्ने अब भी दिमाग पर छाए हुए है। कार स्कूल गेट पर रुकी। मैंने  पूछा -" कितना हुआ?"
ड्राइवर ने बोला -" मैडम पेमेंट हो चूका है।" अविनाश ने ऑनलाइन पेमेंट कर दिया था।  मैं जल्दी से प्रिंसिपल की ऑफिस की तरफ लपकी। ऑफिस गेट पर चपरासी ने मुझे रोका। 
"मैं पलक की मम्मी।प्रिंसिपल सर ने बुलाया है।"
चपरासी हँसते हुए बोला -" जाइए।अंदर सब आपका ही इंतज़ार कर रहे है।  "
चपरासी की हंसी में मुझे राहुल की हंसी सुनाई दे रही थी। करंट-सा दौड़ गया मेरे पूरे शरीर में। आपने आप को संभालते हुए मैंने दरवाजा खोला तो देखा दरवाजे के बाई ओर पलक अकेली खड़ी सुबक रही है। पलक के ही उम्र का लड़का  जो शायद उसकी ही क्लास में पढता है अपने अभिभावक के पास खड़ा है।
प्रिंसिपल सर मुझे देखते ही बोले - "मैडम ये सब मेरे स्कूल में नहीं चलता। आप अपनी बेटी को समझा दे।"
"सर, प्लीज मुझे बताये की हुआ क्या है?" मैंने विनर्मता से पूछा।  पलक दौड़ कर मेरे गले लग कर रोने लगी। मेरा गाला भी भर आया।  फिर मैंने धीरे से उसके कान में कहा- "dont worry palak". मैं हूँ तुम्हारे साथ। "
       लड़के का नाम राज है और वह अपनी मम्मी से एकदम सट कर खड़ा है। राज की  मम्मी ने एक दम से तीखी आवाज़ में बोलना शुरू  किया- "एक तो आपकी बेटी इतना टाईट कुर्ता पहनती है।  ऊपर से अपनी ब्रा ....." वह बोलते-बोलते रुक गयी।  मैं एकटक उन्हें देखे जा रही थी।  इस बार राज के पापा बोले -"अब दिखेगा तो लड़के क्या करेंगे?"
मैं ने बीच  में ही पूछा-"क्या दिखेगा? आप साफ़-साफ़ बोलिये। "
 मेरी ऊंची आवाज़ सुन कर राज के पापा तो चुप हो गए पर, उसकी मम्मी ने बोलना शुरू  कर  दिया- " ब्रा की बैल्ट दिखा रही थी आपकी लड़की।  मेरे बेटे ने तो बस टच कर उसको....." उनकी बात आगे सुने बिना ही मैंने राज को पूरी ताकत से अपनी ओर खींचा और जोर का तमाचा उसकी गाल पर मारा। मेरी इस हरकत की उम्मीद वहाँ  मौजूद किसी भी शख्स को नहीं थी। खुद मुझे भी नहीं थी। प्रिंसिपल सर अपनी कुर्सी से उठते हुए बोले- "मैडम आपने ये गलत किया है।  गलती आपकी लड़की की है.." 
मैं बीच में ही उनकी बात को काटते हुए बोली-"गलती?कैसी गलती सर? ब्रा की स्ट्रिप अगर दिखेगी तो राह चलते लड़को को  लॉइसेन्स मिल जाता है छूने का? और "टाइट कुर्ता " क्या होता है? इनके ब्लाउज से ज्यादा टाइट और डीप कुर्ता  है क्या पलक का?"
 मैंने पलक को कंधे से पकड़ा और जोर से हिलाते हुए पूछा- " पलक जब राज ने तुझे छुआ तो तूने कंप्लेन क्यों किया? उसी वक़्त उसका हाथ क्यों नहीं तोड़ दिया?"
पलक अपनी सिसकी रूकते हुए बोली -"मैंने भी थप्पड़ मारा था मम्मी। इसलिए तो आपको यहाँ बुलाया है।"
उसका जवाब सुन मैं अपनी हँसी नहीं रोक पायी। मैं खिलखिला कर हंस हैं पड़ी और जोर से अपनी बेटी को,अपनी बहादुर बेटी को अपने गले से लगा लिया। नब्बे दशक की लम्हा को इक्सिवि सदी की पलक ने बचा लिया था। पिछली पीढ़ी की माँ तमाशा न बने इस लिए चुप थी। इस पीढ़ी की माँ ने साबित कर दिया था की कि कभी-कभी तमाशा बनना चाहिए ताकि मिसाल बन सको।  



08 जून, 2017

ये कौन लोग हैं ?


मशहूर एक्टर और फ्लिम निर्माता गुरु दत्त साहब ने "प्यासा" फिल्म 1957 में बनाई थी. मुझे ये फिल्म देखने का सौभाग अपने कॉलेज में मिला था जब मेरे डाक्यूमेंट्री टीचर, "श्री मेघनाथ सर" जी ने ये फिल्म दिखाई। इस फिल्म के एक दृश्य में एक तवायफ़ अपने ग्राहक को खुश कर रही होती है तभी उसका बच्चा भूख से रोने लगता है। वह अपना नाच छोड़ जाना चाहती है ताकि अपने भूखे बच्चे को अपना दूध पीला सके। पर, उसे जाने नहीं दिया जाता। कभी मौका मिले तो ये फिल्म देख लीजियेगा।
                         यकीकन नहीं होता। सच,मनो अब भी विश्वास नहीं हो रहा कि अपनी हवस को शांत करने के लिए के लिए तुमने 9 माह की बच्ची को फेक दिया। क्यों ? इज्जत तो तुम लूट ही रहे थे। उसके कपड़ों के साथ उसकी आतम को भी चिर रहे थे। वह तो वैसे ही असाहय-सी थी। फिर क्या जरुरत थी हैवानिएत  की नयी परकाष्ठा साबित करने की?      
            मुझे पता है, तुम मिलोगे कहीं। मेरे साथ ट्रैन में होंगे, बस में, भीड़ में मेरे बगल में खड़े हो मुझे सुघने की कोशिश करोगे। कैसे पहचानूँगी तुम्हे? एक आम-सी लड़की को देश  की "निर्भया" बनाने वाले तुम्हीं थे न? तुम ही हो न उस एसिड अटैक के पीछे वाले हाथ के मालिक ?  और हाँ ,वह तुम्ही हो न लड़कियों  का चरित्र उसकी स्कर्ट की लम्बाई से नापने वाले?
                           वाह रे! मेरा देश और मेरे देशवासी। गौ-हत्या महापाप है। हर तरफ इसके लिए सजा की मागँ हो रही है। कितने गौ-कत्लखानों को बंद करा दिया गया। उस में काम करने वाले मजदूर अपने लिए रोटी का इंतजाम कैसे कर रहे है ,यह वहीं जाने।
                      हम मरी हुई गाय की चमड़ी उखाड़ने वाले को मार-मार कर अधमरा कर देते है।  लेकिन 17 साल का लड़का बलात्कार करते हुए लौहे की रॉड को एक लड़की की योनि में घुसा देता है तो उसे नाबालिक कह कर छोड़ देते है। मुझे घिन्न  आती है ऐसे दोगले विचारधाराओं वाले समाज से। आप लोग नज़र उठायो, समझो! मंदिर-मस्जिद , गौ-हत्या सिर्फ मुद्दा है; राजनीतिक मुद्दा। विकास का सबसे बड़ा मुद्दा होना चाहिए कि बलात्कारियों को मौत की सजा मिलनी और उसे काम कुछ  भी नहीं।

 


11 अप्रैल, 2017

चाहत है अगर सुकून पाने की...


आध्यात्मिक लेखक रोबिन शर्मा ने "5 o'clock club" के बारे में लिखा है कि जिस व्यक्ति के दिनचर्या में सुबह उठना शामिल है, वह अपनी जिंदिगी ज्यादा व्यवस्थित ढंग से और सुकून से जीता है। हमारे भारतीय संस्कृती में तो बर्ह्म मुहर्त में उठने की परम्परा है।परन्तु, वैश्यविकरण और नीजिकरण के कारण हमारी जीवन शैली बहुत बदल गयी है। 9 टू 5 जॉब बस कहने भर को है।वरना,अब तो 12-13 घण्टे काम करना पड़ता है।आज की तारीख में सरकारी और गैर-सरकारी दफ्तरों में काम का बोझ बढ़ता ही जा रहा है।ऐसे में जो इंसान रात के एक बजे सोये वह सुबह 5 बजे कैसे उठे? यह सावल नही समस्या है।इसका समाधान भी हमारे-आपकी आँखों के सामने है। जरूरत है तो watsup को ऑफ करने की,फेसबुक से लॉगआउट होने की और टीवी के रिमोट को छोड़ने की।
                        जी हाँ,आपने सही बात पकड़ी है। आप जितनी जल्दी इन चीजों को अपने से दूर करेगें उतनी जल्दी आप बिस्तर पर,किसी अपनो के कंधे को तकिया बना कर सो रहे होंगे। जब ऐसा सोच कर ही इतना सुकून मिल रहा है तो ऐसा कर के भी देखिए। ऐसा करना मुश्किल है इसलिए हम इसे तीन स्टेप में करने की कोशिश करेगें।

                 " नियम  "
1) रात 11:00 बजे के बाद इंटरनेट का इस्तमाल नहीं करना।
2)रात 11:30 बजे के बाद नाही टीवी देखना और नाही फ़ोन पर बात करना।
3)  सुबह 6:00बजे उठना।
    
 फर्स्ट स्टेप- पहले तीन दिन इन नियमों का पालन करें।अगर आपने यह तीन दिन पार लगा लिया तो सचमुच आप में बहुत हिम्मत है।
   
  सेकण्ड स्टेप- अब पाँच दिन का लक्ष्य रखें।आपने अगर इन आठ दिनों को भी पार कर लिया तो आपमें अपनी जिंदिगी को बदलने की अद्भुत शक्ति है।
      
थर्ड और आखरी स्टेप- अपनी 8 दिन की कठोर तपस्या की सफलता की ख़ुशी को दो-से गुना करें और अगले 16 दिन इंटरनेट और टीवी को जल्दी शुभरात्रि बोलें।
                        आपने पूरे 24 दिन इस कठिन नियमों का पालन किया है।अब यह नियम आपको कष्टदायक नही लगेंगे क्योंकि अब-तक यह आपकी आदत बन चुके होंगे। मनोविज्ञान कहता है कि किसी भी मनुष्य को कोई भी आदत विकसीत करने में 21 दिन लगते है और ज़नाब, आपने तो 24 दिन पूरे किये है।
                       आज की खुशहाल जिंदिगी के बस यहीं तीन नियम हैं। जहाँ इतना पैसा कमाया हैं वहाँ, खुद के लिए थोड़ा सुकून भी खरीद लो।

06 अप्रैल, 2017

राम नहीं, रावण भी नही.... चाहिए तो सिर्फ विभीषण !!!

मेरे अंदर राम नहीँ। मेरे अंदर रावण भी नहीं है। अगर कोई है तो सिर्फ विभीषण  है। चौकाने की कोई बात नही है। राम को कभी मैंने भगवान् माना ही नही। राम की मर्यादापुर्षोत्तम वाली छवि कभी मेरे मन-मंदिर में आयी ही नहीं। जब संबंधों की समझ नही थी तब भी कभी मैंने राम को नही पूजा। अब तो स्त्री-पुरूष की देह से लेकर आत्मा तक के रिश्ते को जानती हूँ। ऐसे में पत्नी से अग्निपरीक्षा  दिलाने वाले पति को कैसे पूजती ?
           हाँ , मेरे अंदर विभीषण रहता है। और कोई भी युग क्यों न हो; राम-रावण बनना आसान है पर, विभीषण को जीना बेहद मुश्किल है। राम अच्छाई के लिए लड़े। रावण अपने अहंकार के लिए लड़ा। परन्तु, विभीषण सच के लिए लड़े। युद्ध भूमि में शत्रु को मारने के लिए हिम्मत चाहिए। पर, उसी युद्ध भूमि में अपने को मारने के लिए बहुत बड़ा कालेजा और दिल  की ईमानदारी चाहिए। 
                          लोग कहते है कि " कैकई जैसी माता और विभीषण जैसा भाई भगवान् किसी को न दे"। क्यों? क्योंकि विभीषण ने रावण का भेद उसके शत्रु राम को बतलाया था। आपने तो वह मुहावरा सूना ही होगा "घर का भेदी लंका ढाये"।  तुलसी हो या रहीम हो किसी की कृति में विभीषण को सम्मान नही मिला... कम-से-कम मैंने तो  नही पढ़ा आजतक।  धर्म की किताब पढ़ने वालो ने सिर्फ राम की जीत देखी ; रावण का नाश देखा; सीता का वनवास देखा... नही देख पाए तो विभीषण का त्याग-उसकी हिम्मत।  रामानंद सागर की रामायण मैंने नही देखी। २००८-२००९ साल ठीक से याद नही, उस वक़्त  NDTV Imagine पर रामायण सीरियल आता था।  वह देखा था मैंने। इस सीरियल की पटकथा पहले वाले रामायण सी ही थी पर, इसका दृष्टिकोण नया था।  फिर  अभी कुछ महीनो पहले तक स्टार प्लस पर "सिया के राम" आता था।  वह भी देखा है मैंने।विभीषण का भाई प्रेम देखा। अपनी भाभी के प्रति उनका सम्मान देखा। और जो मेरी समझ में आया वह थी सच के प्रति उनकी निष्ठां।  
                                              हम  सब के अंदर बसे  रांम-रावण को कुछ न कुछ चाहिए। किसी को प्यार,किसी को घर-द्वार, किसी को देह, किसी को भोग-विलास।  परन्तु, सच किसी को नही चाहिए।  क्योंकि किसी के अंदर विभीषण  नही है।  मुझे लगता है कि भगवान् या  शैतान बनना आसान है पर, इंसान बने रहना मुश्किल है। तभी शायद आज कल हर तरफ इतना कोलाहल है..... 

03 अक्टूबर, 2015

पुरानी जिंदिगी में कुछ नया करने की कोशिश

क्यों विध्वंस जरुरी है?खोने का गम मिलने की ख़ुशी की कीमत क्यों है? आखिर क्यों एक सांस को अंदर लेने के लिए दूसरी सांस को छोड़ना पड़ता है और इस मामूली सी क्रिया को ही जिंदा रहना कहा जाता है? सवाल कई है और जवाब भी है। लेकिन ये मन है की सिर्फ "क्यों" करता जाता है। उसे "क्यों है" से कोई खास लगाव नहीं है। शायद ऐसा करने से बैचेनी कम होती है।मन को तसल्ली होती है।कभी कभी ज़ोर से अकेले चिल्लाने से भी मन हल्का हो जाता है। बंद बाथरूम में शॉवर के निचे खड़े होने से भी आत्मा हल्की हो जाती है। रोज़ ख़त्म होती जिंदिगी में यह सब करना जरुर है। इसे हिम्मत मिलती है ज़िंदा रहने की।

दूरियाँ.....


हम दोनों के बीच की दूरियाँ सिर्फ कुछ कदमो की थी।
लेकिन ये कुछ कदम हम उम्र भर तय नही कर पाये।
प्यार ना तुम्हारा कम था ना मेरी वफ़ा में कोई कमी थी।
फिर भी ना जाने क्यों हम एक हो कर भी एक दूसरे से अलग ही रहे।
रेल की पटरियों की तरह साथ रहे और मिल कर भी ना मिले। 
आज सोचती हूँ कि उस वक़्त ऐसा क्या हुआ जो तुमने पलट कर भी नही देखा, 
तुमने फिर कभी मेरी सुध नही ली।
आखिर एक लम्हे में मैंने ऐसा क्या कर दिया जो हम जिंदिगी भर के लिए बेगानें होगये।
        लोगो से सुनती हूँ कि ऊपरवाला जो करता है अच्छे के लिए ही करता है।
ही मान कर मैंने अपनी जिंदिगी की गाडी आगे ले ली।
 तुम किस रह गए मुझे इसकी ख़बर नही लेकिन इतना जरूर जानती हूँ कि तुम्हारी जिंदिगी से मैं हमेशा के लिए जा चुकी हूँ।अजीब बात है, तुम किस बात पर खफ़ा हुए मुझे वह बात पता भी नही और उम्रभर की दूरियां बना दी तुमने।

जंग जरी है...।

आज खुद से खुद की जंग है।
परिवारिक रिश्तों को सँभालते हुए खुद को भी सँभालने की कोशिश जरी है।
किसी की बेटी हूँ, बीवी हूँ, माँ हूँ प्यारे से बेटे की, फिर भी लगता है कुछ नही हूँ। 
"कोई नही" से "कुछ है" तक का सफ़र जरी है। 
मेरी खुद से जंग जरी है।

23 जनवरी, 2013

कैसे कहूँ   की मैं जी  रही हूँ
उड़ती चिड़िया के पंख
कमरे में कैद रह कर रोज गिनती हूँ
टीन की छत पर बारिश की
आवाज़ रोज सुनती  हूँ
लेकिन कभी तन भीग नहीं पाता
मन का सूखापन सिर्फ बारिश की आवाज़ से हरा नहीं होता .
 कैसे कहूँ की जी रही हूँ मैं।।

30 जून, 2012

ek aur koshish...

 जिंदा रहेने के लिए आदमी का कुछ-न-कुछ करते रहेना जरुरी है. इस सच को  मैं मानती हूँ पर जब कोई खुद को जिंदा ही न समझे तो फिर??????  साँसों का चलना ही सिर्फ किसी के  जीवित रहेने कि निशानी नहीं होती. बहुत पहेले मैन एक पौधा लगाया था. सोचा था वह समय के साथ बढेगा और घना होगा. लेकिन  पानी और हवा की कमी के कारण वह पौधा समय से पहेले ही सुख गया. आज भी उस का एक पत्ता मेरी किताब के बीच में है. सुख चुके  उस पत्ते को जब-जब देखती हूँ मुझे मेरी नाकामयाब कोशिश याद आती है. एसा लगता है मानो मुझ पर सारा बाग़  हँस रहा हो. अपनी हार से उबरना मुश्किल होता है. उस से भी ज्यादा कठिन होता है अपने पराजय के साथ जीना. पर जो यह काम कर गया वह  आदमी कहा लता है. जिंदिगी  कि रहा में  कई उतर-चढ़ाव आते हैं . जो इनसे पार पता है वही तो जिंदा रहे का हक पता है. यही सोच कर फिर से  मैन कोशिश की है एक और पौधे को लगाने की. देखते है इस बार कौन हँसता है!!!!!



22 जून, 2012

कई दिनों से कुछ नया नहीं   सोचा है . "सोच" कि बंजर भूमि पर कई दिनों से विचारों का अंकुर नहीं फूटा है . ठूंठ पर चुके मस्तिक में नयी अनुभूति की कोई कोपल नही फूटी है . सुना है  गिली मिट्टी पर नए पौधे जल्दी पनपते है . चर्चा या विचार-विमर्श की बारिश हो तो मेरी सोच की जमीं भी कुछ नम पड़े और मैं भी नया सृजन कर सकूँ . 

19 मार्च, 2011

kabhi kabhi jeet hi sab kuch hai

जिंदिगी में सिर्फ जीत ही जरुरी नहीं होती.परन्तु  कभी-कभी जिंदिगी में जीत ही सब कुछ बन जाती है. मेरे लिए अभी जीत ही सब कुछ है....अपनी जिंदिगी में मैंने कभी रुक कर जीत का इन्तिज़ार नहीं किया, वोह नहीं मिली तो हार के साथ ही आगे बढ़ गयी. लेकिन आज मुझे खुद से लड़ना है ...उन सपनो को पूरा करना है जिन्हें देखने की भी  हिम्मंत ये आँखे नहीं कर पाई. मुझे उम्मीद है की मेरे सपने हकीकत बनेगाये. क्योंकि सुना है कि क्षितिज पर जीमन-आसमान का मिल होटा है.

17 सितंबर, 2010

waqt humare pass nahi hai

कितनी खामोश थी उसकी आँखें,
कितना कुछ कहना चाहती थी मेरी जुबां,
होठ हिलते, पर लब्ज न निकलते
हर बार कुछ कह कर भी कुछ न कह पते.
जाने कैसी थी वो बेबसी, कैसा दौर था वह भी;
था बहुत कुछ कहने-सुनने को पर,नहीं था तो वक़्त... .


सदियों बाद मिलें है हम,फिर बारिस कि बूंदों के साथ.
कभी भीगे थे साथ में हम,उसी वर्षा कि बूंदों से आज भी मेरी आत्मा भीगी है
एक सोंधी सी खुशबू अब तक बसीं है;
आज फिर बारिस ने हमें एक साथ भिगोया है,
वह गुजरा हुआ पल लौटाया है... .



मन तो अभी भी गिला-गिला सा है उसकी कोमल भावनायों से,
पर, है अब बहुत कुछ बदला-बदला सा.
कहना था मुझे बहुत कुछ,सुनना था उससे बहुत कुछ
पर वही बेबसी आज भी है, सब कुछ होते हुए भी 
बस वह वक़्त हमारे पास नहीं है.

30 जुलाई, 2010

हम इंसान है!

हाथों की अनबुझी लकीरों में जकड़ा इंसान हमेशा अपने भविष्य को जानने की चाहत में उतावला रहता है। उस कल के बारे में सोचता है जिससे वह अनजान है। हम "कल क्या होगा " की फिक्र में "आज क्या करें" भूल जाते हैं। सदियाँ बीत गयी पर, हम आज भी बदले। हम भूत- भविष्य और इस ग्रह-नक्षत्र के चक्कर से कभी आजाद नहीं हो पायेगे। हीरा पहनो, भाग्य चमकेगा...मोती पहनो, मन शांत रहेगा...जाने क्या - क्या पहना और करना पड़ता है अपने को कामियाब बनाने के लिए।
मनुष्य अपनी गलतियों से सीखता है। जानवर भी अपनी गलतियों से सीखते हैं। लेकिन दोनों में फर्क है। जानवर अपनी गलती नहीं दुहराते, मनुष्य दुहराते हैं। जानवर आज में जीता है और हम कल में जीते हैं। हम या तो बीत चुके कल में जीते हैं या फिर आने वाले कल में जीते हैं। एक बात तो पक्की होती है किहम किसी भी हाल में आज में नहीं जीते।

28 जुलाई, 2010

पर - कटी

मैं उड़ती हुई चिड़िया थी,
मुझे कैद किया गया।
कैद के अन्दर कोशिश कि...
और पंखो के संघर्ष की आवाज से तंग हो,
काट किये मेरे पर।
अब मैं सिर्फ आसमां को देखती हूँ,
नीले रंग के इस अनोखे जहाँ को तकती हूँ।
सब से ऊँचा उड़ना चाहती थी, औरों से आगे निकलना चाहती थी
छोटे से पंखो को फैला कर विशाल आसमां ढँक लेना चाहती थी...
अब बेबस हूँ क्यूंकि...मैं पर-कटी चिड़िया हूँ।

अगर देखनी हो मेरी उड़ान...

अगर देखनी हो मेरी उड़ान,
तो आसमां को और ऊँचा कर दो
जो पंख मैं फैलाऊ तो इस जहाँ को और बड़ा कर दो।
अपनी परछाई कि साथी हूँ, अपनी ही दुनिया में जीती हूँ
कौन हूँ मैं, क्या हूँ मैं
मैं तुम्हे क्यों बताऊ
जो तुम देखना चाहो वजूद मेरा
पहले दिल अपना साफ़ कर के देख लो
अगर देखनी हो मेरी उड़ान
तो आसमां को और थोडा ऊँचा कर दो।

02 जून, 2010

शिष्टता में कैद बचपन...

बाल मजदूर सिर्फ गरीब परिवार के बच्चे नहीं होते है। हाई सोसाइटी के बाल मजदूर थोड़े अलग होते है। यहाँ उन्हें हर काम अपने मम्मी-पापा की आज्ञा के मुताबिक करना होता है। अभिभावकों के शिष्टाचार में गुम होते बचपन के बारे में किसी ने सोचा है?
कहते है कि ईश्वर बच्चो की हँसी में बस्ता है, क्योंकि वह भी जनता है कीउम्र के बाकि पड़ाव में लोग चेहरे पर हँसी के मुखौटे पहन लेते है। इस सचाई से हम सब वाकिफ है कि दुनियादारी किसी को मासूम नहीं रहने देती। फिर क्यों वक़्त से पहेले ही कुछ अभिभावक अपने बच्चो की मासूमियत की हत्या कर देते है? सरकार का ध्यान बाल-मजदूरी पर तो जाता है लेकिन बड़े घर के उन बच्चो पर नहीं जाता जो एक तरह से बंधुआ मजदूर की तरह ही अपना जीवन गुजार रहे है। बाग़ के माली को पता है कि उसके पौधे के लिए क्या सही है और क्या गलत। परन्तु, ध्यान देने वाली बात यह है कि क्या माली को पता है कि जो वह कर रहा है वह सही कर रहा है?
सुनहरे धागे की डोर से बंधी बुलबुल , सोने के पिंजरे में भी ख़ुशी का गीत नहीं गा सकती। उसे उड़ने को खुला आसंमा चाहिए। बच्चो का बचपन भी इस बुलबुल की तरह ही है। अभिभावकों को समझना होगा कि बचपन की स्वतंत्रता अशिष्टता का अभिप्राय: नहीं है। बल्कि उसके संम्पूर्ण विकास की सीढ़ी है।

31 मई, 2010

पर्दा है यह पर्दा...

पर्दे में रहने दो पर्दा ना उठायो, पर्दा जो उठ गया तो राज खुल जायेगा...गाना खुबसूरत है और इस फिल्म की अदाकारा भी बेहद सुन्दर थी। परन्तु, पर्दे में ही वह रहती तो क्या खुद की पहचान बना पाती? आपको आइना फिल्म का गाना भी याद होगा...आइना है चेहरा मेरा...और इसी आईने को इंसानों ने ढ़क रखा है !
मैं महिलायों के पर्दे करने के खिलाफ नहीं हू और न ही इसके समर्थन में। क्योकि मेरे लिए चेहरे को पर्दे में रखना ठीक उसी तरह है जैसे मेरे कमरे की खिड़कियों पर लगे पर्दे है। जब सुबह की रोशनी चाहिए, तो मैं पर्दे को सरका देती हू । सच मानिए, आत्मा और सूरज की लालिमा दोनों एक-देशों के आगोश में होते है। पर्दा करना मेरी जरूरत है मज़बूरी नहीं। धूप में रंग सांवला नहीं होने देता, मनचलों की नजरों में आने नहीं देता और भीड़ में मेरे मन के भाव छिपा लेता है।
फ्रांस और बेल्गियम में औरतो के बुर्के पहने पर रोक है। भारत-पाकिस्तान आदि कई देशो में पर्दा करना मज़हब से जोड़ा जाता है। अजीब बात है पहले मज़हब के ठेकेदार तय करते थे कि औरतो को क्या पहना है और क्या नहीं पहना। अब यह काम सरकार करेगी।
मन में दो सवाल है-क्या औरतो के पर्दे में रहने से बलात्कार की संख्या कम हो जायेगी? और क्या उनके पर्दा न करने से पुरुष वर्ग हर चौक-चोराहे पर लार-टपकते नज़र आयेगे? बुर्के पर राजनीति करने वालो कृपा कर अपने सोच को बदलो। औरते क्या पहनेगी, कौन से लिंग का बच्चा जन्म देगी, यह सब सवाल हमारी सड़ चुकी मानसिकता की वजह से है। एक तरह की अजीब-सी बू है इन सवालो में जो बार-बार इस बात की तरफ इशारा कर रही है कि आजाद देश के नागरिक, अपनी "पुरुषत्व" की भावना में कैद है। हमे याद रखना चाहिए की लाज का पानी आखों में होता है और अगर यही सूख जाए तो यही आख़े सात ताले पार भी जिस्म को भेद सकते है।

18 मार्च, 2010

इंग्लिश का भूत

आँखे बंद है। अंधरे कमरे से आवाज़ आ रही है - "...कैरियर बनाना है तो इंग्लिश सीखो ...,...छे महीने में फर्राटेदार अग्रेजी सीखे..."। मोबाइल पर मेसेज टोने बजता है। अचानक राज की नींद टूटती है। देखा घडी में सात बजने वाले थे। वह मेसेज देखता है । मोबाइल कंपनी की ओरसे मेसेज था जो हिंदी दिवस पर फ्री शेरो-शाएरी मेसेज पैक देने की बात कर रहा था । कैलंडर की तरफ देखता है तो आज १४ सितम्बर है। जल्दी से उठता है और तैयार हो कर घर से निकलता है।

रस्ते में एक दुकान पर चाये पिने रुकता है। कुछ लड़के इंग्लिश में बाते कर रहे है...

"यार इट्स वैरी इम्पोर्टेन्ट टू लेअर्ण इंग्लिश..."

..."एस यू आर राईट। एवेरी जॉब डिमांड इंग्लिश स्पेअकिंग बॉय..."

राज चाये पीते हुए उनकी बाते सुनता है ओर चल देता है। वह एक बिल्डिंग के अन्दर जाता है जिस के ऊपर लिखा है...छे महीने में अग्रेजी बोलना सीखे।

क्लास के अन्दर- राज बेठा हुआ है , सर इंग्लिश बोलने की क्लास ले रहे है और इंग्लिश की महत्वता को बता रहे है..."टू लीव इन थिस वर्ल्ड यू मस्ट लेअर्ण थिस लैंग्वेज "। तभी एक स्टुडेंट बोलता है - " हम को तो इंग्लिश सिखने का है। अपनी इज्ज़त बढ़ेगी और आगे नौकरी भी मिलेगी..."। राज सोचने लगता है - "इनकी हिंदी कितनी ख़राब है। इन लोगो को तो हिंदी के व्याकरण के बारे में तो कुछ भी नहीं पता...हमारे शहर में इंग्लिश सिखाने वाले तो बहुत है पर हिंदी ठीक से बोलने वाले बहुत कम..."

घंटी बजती है और वह क्लास से बहार निकल जाता है। घर जाने के रस्ते में वह देखता है की सभी दुकानों पर इंग्लिश में नाम लिखे हुए है , लडको ने इंग्लिश में छापी टी-शर्ट पहन रखी है...उस हर तरफ इंग्लिश का ही बोलबाला देखाई दे रहा है। वह सोचता है की " हिंदुस्तान से हिंदी गायब हो रही है.... " (पीछे से गाने की आवाज़ आ रही है , "हिंदी है हम;हिंदुस्तान हमारा, हमारा....")

राज घर के पास पहुचता है। कुछ बच्चे खेल रहे है। एक बच्चा दूसरे बच्चे से बोलता है - "तुमने मेरा शर्ट फाड़ा है"।

"मैंने नहीं फदी है..."

तुम झूठ बोलते हो। अगर तुमने नहीं किया तो क्या मैंने किया?"

....राज बच्चो की बाते सुन रहा था। उसने दोनों को अपने पास बुलाया और बोला - "खेल-खेल में यह सब होता है। तुम लोग इतने अच्छे स्कूल में पड़ते हो फिर भी तुम लोगो को हिंदी ग्रामर नहीं आता है..."

एक बच्चा बोलता है-" भैया हम लोग हिंदी ग्रामर सिर्फ एक्साम टाइम पड़ते है इस में तो बस पास करना होता है..."

राज बोलता है-" ठीक है। मुझे पता है स्कूल में हिंदी को कितना महत्व दिया जाता है। मेरे उम्र के लड़के गलत भाषा बोलते है। आजकल तो बस सब को इंग्लिश सीखना है। तुम लोग मुझे ये बतायो की अगर मैं तुम लोगो को हिंदी ग्रामर सिखायु तो सीखोगे?"

एक बच्चा-" एस आई विल, लेकिन फिर आपको हम लोगो को किसी लेखक की कहानी सुनानी पड़ेगी। हमारे किताब में हिंदी लेखक की कहानी सिर्फ पाच- छे ही है"।

राज मुस्कुराने लगता है और सोचता है, हिंदुस्तान से अभी हिंदी पूरी तरह नहीं गया है।

(पीछे से गाने की आवाज़ आ रही है...हिंदी है हम हिंदुस्तान हमारा,हमारा.....)

12 मार्च, 2010

लेकिन यहाँ भी दोनों एक - दूसरेको अपना ग़रूर ही सौपते है.

05 मार्च, 2010

बलात्कार शरीर का नहीं होता.

८ मार्च को हम महिला दिवस मानते है। इस दिन के बारे में कहाजाता है किइस दिन को हम समाज में उनको उनके हक और सामान दे ने का निश्चय करते है...औरत कि इज्जत को पांच मीटर कि साड़ी में लपेटने वाले जब लोग इनके मान-सम्मान कि बात करते है टी आत्मा तड़पती है। मेरे अन्दर कि औरत रोने लगती है। क्या हम लड़कियों कि इज्जत दुपट्टे और साड़ी में लिपटी होती है जिसे जब चाहे कोई भी राह चलता हमारे तन से अलग करदे? क्या हमारी इज्जत कि इतनी ही औकात है कि हवा का तेज छोका भी उसे हिला ने?


समझ नहीं पाईआज तक कि वास्तव में बलात्कार किस का होता है? शरीर का,आत्मा का या औरत के आत्म-सम्मान का? मैं नहीं मानती कि बलात्कार शरीर का होता है। वास्तव में यह तो एक माध्यम है अपनी हवस मिटाने का और किसी के आत्म-सम्मान को रौदने का। एक औरत जब किसी मर्द को अपना तन सौपतीहै तो हकीकत में वह उसे अपना आत्म-सम्मान सौपती है। शरीर तो एक माध्यम होता है यह साबित करने के लिए कि हाँ,मुझे तुम विश्वास है"। आजकल तो गे और लिस्बियन का चलन जायज होगया है।